चित्तौड़गढ़। यूआईटी की विकास कार्यों की सूची क्या व्हाट्सएप ग्रुप में पहुंची, ग्रुप के सदस्यों ने भी अपने-अपने इलाकों का विकास मानचित्र खोल दिया। सूची में जिन सड़कों और नालियों का नाम था, वे खुश हुए और जिनका नहीं था, उन्होंने सवालों की पोटली खोल दी।
जवाब में आश्वासन भी आए और आशावाद भी। लेकिन असली रंग तो तब चढ़ा, जब किसी ने कह दिया कि "1947 से 2014 तक नहीं बना, अब बन जाएगा... चिंता मत करो।" फिर क्या था, एक के बाद एक चुटकियां चलती रहीं।
संगम रोड के गड्ढों पर तो ऐसा व्यंग्य हुआ कि किसी ने सलाह दे डाली कि सड़क परिवहन विभाग के साथ जल परिवहन विभाग को भी तैयार रहना चाहिए। दावा किया गया कि अगर बारिश ऐसी ही रही तो कोतवाली से संगम महादेव तक नाव चलाने की नौबत आ सकती है।
इधर एक सदस्य ने जनप्रतिनिधियों का कार्यकाल 15 साल और बढ़ाने की सलाह भी दे डाली, शायद उनका मानना था कि विकास को भी "लॉन्ग टर्म प्लान" की जरूरत होती है।
आखिर में बहस "सपनों" और "हकीकत" तक पहुंच गई। एक तरफ सपने दिखे, दूसरी तरफ हकीकत का दावा। हालांकि व्हाट्सएप ग्रुप के बाकी सदस्य यह तय नहीं कर पाए कि जीत आखिर विकास की हुई या व्यंग्य की।
फिलहाल इतना तय है कि शहर की कुछ सड़कें भले अभी बननी बाकी हों, लेकिन राजनीतिक तंज की सड़क पूरी तरह फोरलेन हो चुकी है।



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