चित्तौड़गढ़ | संवाददाता: ओम भट्ट, 8000191859
“मेरे लिए चित्तौड़गढ़ जिला कलेक्टर साहब आलोक रंजन भगवान से कम नहीं हैं। जब मुझे सामने मौत खड़ी दिखाई दे रही थी और परिवार की उम्मीद पूरी तरह टूट चुकी थी, तब कलेक्टर साहब देवदूत बनकर आए।”
यह कहना है चित्तौड़गढ़ फायर स्टेशन पर कार्यरत सहायक कर्मचारी धर्म प्रसाद वैष्णव का। धर्म प्रसाद की कहानी प्रशासनिक संवेदनशीलता और मानवीय सरोकार की एक प्रेरक मिसाल बयां करती है, जहां जिला कलेक्टर आलोक रंजन ने अपने अधीन कार्यरत कर्मचारी की गंभीर बीमारी के दौरान व्यक्तिगत पहल कर समय पर उपचार सुनिश्चित करवाते हुए उसकी जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
करीब चार वर्षों से कलेक्टर आवास पर सेवाएं दे रहे सहायक कर्मचारी धर्म प्रसाद को अचानक स्वास्थ्य संबंधी समस्या हुई। प्रारंभिक जांच के बाद जब विस्तृत परीक्षण करवाए गए तो प्रोस्टेट कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का पता चला। यह खबर सुनते ही परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई। पत्नी, तीन वर्षीय पुत्र और वृद्ध मां की जिम्मेदारी उन्हीं पर थी, ऐसे में आर्थिक और मानसिक दोनों संकट खड़े हो गए।
गत वर्ष 21 अप्रैल को ड्यूटी के दौरान ही धर्म प्रसाद की तबीयत अधिक बिगड़ गई। सूचना मिलते ही जिला कलेक्टर ने तत्काल वाहन की व्यवस्था कर उन्हें उदयपुर स्थित निजी अस्पताल रेफर करवाया और राज्य सरकार की आरजेएचएस योजना के तहत उपचार शुरू कराया। करीब दो महीने तक चले इलाज के दौरान कलेक्टर स्वयं पूरी मोनिटरिंग करते रहे और चिकित्सकों से लगातार संपर्क बनाए रखा। उदयपुर के तत्कालीन जिला कलेक्टर नमित मेहता से समन्वय कर आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं सुनिश्चित की गईं।
धर्म प्रसाद बताते हैं कि बीमारी का पता चलते ही परिवार की उम्मीद लगभग टूट चुकी थी, लेकिन कलेक्टर साहब ने हौसला देते हुए कहा कि इलाज की चिंता न करें, जहां भी सर्वोत्तम उपचार संभव होगा, वहां पूरा इलाज कराया जाएगा। उपचार के बाद उनकी हालत में सुधार हुआ और वे स्वस्थ होकर चित्तौड़गढ़ लौट आए। पूरी तरह ठीक होकर वर्तमान में वे अग्निशमन विभाग में सहायक कर्मचारी के रूप में पदस्थ हैं।
घर वापसी के बाद परिवार में खुशियों का माहौल है। अपने स्वस्थ पिता को देखकर छोटा बेटा बेहद प्रसन्न है। भावुक होते हुए धर्म प्रसाद कहते हैं, “जब कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था, तब साहब ने हमारा साथ दिया। आज मैं जीवित हूं तो उनकी वजह से। मेरे लिए वे भगवान से कम नहीं हैं।” यह पूरा घटनाक्रम प्रशासन के उस मानवीय चेहरे को उजागर करता है, जहां एक जिले के सर्वोच्च अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारी को परिवार का सदस्य मानते हुए उसकी जिंदगी बचाने में अहम भूमिका अदा करते है।
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